अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस, 25 नवम्बर 2019

अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस, 25 नवम्बर 2019

 

 

महिलाओं के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती, चाहे परिवार हो, समाज हो, राष्ट्र हो, हमेशा से स्त्री विभिन्न क्षेत्रों में इन्सान के जीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं। इन सब के बावजूद आज भी महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में हर पड़ाव पर भेदभाव व कई प्रकार की हिंसा का सामना करना पड़ रहा है जो सदियों से चला आ रहा है। सतत विकास के लिए महिलाओं का विकसित होना जरुरी है और इसी सन्दर्भ में संयुक्तराष्ट्र संघ ने विश्व के विभिन्न देशों में 25 नवम्बर को महिलाओं के विरुद्ध अंतराष्ट्रीय हिंसा उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व  महासचिव बान की मून ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा के लिए सभ्य समाज के निवासियों को संकल्प लेना चाहिए कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा मानव अधिकारों का उल्लंघन है और इसका मूल कारण समाज में महिलाओं के प्रति भेदभाव है।

संयुक्त राष्ट्र ने इस बात का उल्लेख किया है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा का मामला शिक्षा, गरीबी, बीमारी, सुरक्षा और शांति के मामलों में भी जुड़ा हुआ है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा की गंभीरता इसी बात से लगायी जा सकती है विश्व की 70 प्रतिशत महिलाएं सम्पूर्ण जीवन में कभी ना कभी हिंसा का शिकार होती है। सामाजिक रूप से रचित पुरुषोचित अनुभव को विश्वव्यापी अनुभव के रूप में दर्शाया जाता है तथा इसे महिलाओं और समाज को थोपा जाता है।

इतिहास साक्षी है कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार और यातना देना आम बात हो गयी है, चाहे भारत- पाकिस्तान का विभाजन या फिर 1971 में लगभग 2 लाख बांग्ला महिलाओं के साथ पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा बलात्कार तथा तरह-तरह की यातना दी गयी। 1990 में युगोस्लाविया से अलग हुआ राज्य बोस्निया में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया। इस प्रकार नारी के शरीर को शत्रु की सम्पति मानकर उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। युद्ध या प्राकृतिक घटनाओं का सबसे ज्यादा मनोवैज्ञानिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। मानवाधिकार और शरणार्थी आयोग के अनुसार विश्व में विस्थापित शरणार्थियों की कुल संख्या का 70 से 80 प्रतिशत महिला है। ऐसे चौकाने वाले तथ्यों से स्पष्ट होता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन के लिए इस दिवस की प्रासंगिकता कितनी जरुरी है।  

 

गत वर्षों में महिलाओं के खिलाफ हुई हिंसा और उनके तथ्य: महिलाओं के खिलाफ हिंसा से होने वाली मौतों की संख्या कैंसर और मलेरिया जैसी भयकर बीमारी से भी ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक:

3 में से 1 महिला को अपने जीवनकाल में शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है।

52 प्रतिशत महिलाएं ही अपने बारे में स्वतंत्र फैसले ले पाती है।

दुनियाभर में लगभग 750 मिलियन लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है जिसके कारण तकरीबन 200 मिलियन महिलाओं को जननांग विकृति का शिकार होना पड़ता है।

2017 के आंकड़ो के अनुसार 2 में से 1 महिला को या तो उसके पार्टनर द्वारा या फिर परिवार के सदस्यों द्वारा मार दिया जाता है।

मानव तस्करी के सभी मामलों में लगभग 71 प्रतिशत महिलाएं और लड़किया होती है और उनमें से ज्यादातर के साथ यौन शोषण होता है।

यूरोपीय संघ की रिपोर्ट में 10 महिलाओं में से एक ने 15 साल की उम्र से साइबर-उत्पीड़न का अनुभव किया है। 18 से 29 वर्ष की आयु के बीच युवा महिलाओं में जोखिम सबसे अधिक है।

इस प्रकार चिंतन और मनन करने बाद पता चलता है कि महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीड़न, फब्तियां कसने, छेड़खानी, वैश्यावृत्ति, गर्भाधारण के लिए विवश करना, महिलाओं और लड़कियों को खरीदना और बेचना, युद्ध से उत्पन्न हिंसक व्यवहार और जेलों में भीषण यातनाओं का क्रम अभी भी महिलाओं के विरुद्ध जारी है और इसमें कमी होने के बजाए वृद्धि हो रही है, जो एक वैश्विक महामारी हो गई है।

 

भारत के सन्दर्भ में: यद्यपि भारत के संविधान में महिलाओं को व्यापक अधिकार दिए गए है, लेकिन महिलाएं अपनी जाति, धर्म और मूल पहचान के कारण बलात्कार, छेड़छाड़, उत्पीड़न और हत्या का शिकार होती रहती हैं। संविधान के अनुच्छेद 15 में बताया गया है धर्म, जाति, जन्मस्थान और लिंग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता और अनुच्छेद 39 में महिलाओं के लिए समान वेतन के बारे में बताया गया है। लेकिन दुर्भाग्य है कि भी महिलाओं  को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है। भले ही भारत सरकार वर्तमान में महिला सशक्तिकरण के लिए कई प्रकार के कार्य कर रही है परन्तु आधुनिक युग में ज्यादातर महिलाएं अपने अधिकारों से कोसों दूर हैं। सरकार ने महिलाओं के उत्थान के लिए भले ही सैंकड़ों योजनाएं तैयार की हों, परंतु महिला वर्ग में आज भी शिक्षा और जागरूकता की कमी है। आज भी महिलाओं की उच्च शिक्षा दर मात्र 23.5 है जो सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करती है। अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों से बेखबर महिलाओं की दुनिया को चूल्हे चौके तक ही सीमित रखा है। भारत में आदिवासी समुदाय की महिलाएं अपने अधिकारों से बेखबर हैं और उनका जीवन आज भी एक त्रासदी की तरह है।

महिलाओं और युवतियों पर कहीं एसिड अटैक हो रहे हैं, तो कहीं निरंतर हत्याएं-बलात्कार दहेज उत्पीड़न की घटनाएं हो रही हैं। इन घटनाओं का काफी विरोध किया जाता हैं, धरना प्रदर्शन होता है मीडिया भी सक्रिय होता है पर अपराध की दर कम होने के बजाय निरंतर बढ़ती जा रही है।

धार्मिक आस्था और परम्पराओं की बात करे तो महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। भारत के संविधान में अनुच्छेद 21 में कहा गया है व्यक्ति को अपनी जिन्दगी गरिमापूर्ण जीने का अधिकार है तो फिर इस आधी आबादी के साथ यह दुर्व्यवहार क्यों? कभी सबरीमाला विवाद तो कभी महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मन्दिर विवाद।

 

इस प्रकार हम देखते है कि एक ओर भारत में सरकार और न्यायालय द्वारा समय-समय पर महिलाओं के अधिकारों के लिए इच्छाशक्ति दिखाई है लेकिन विडम्बना है कि पुरुष वर्चस्व के पक्षधर लोग आज भी महिलाओं के मानवीय अधिकारों के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण रख रहें है।

आखिर क्यों आया अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस विचार: अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाने का प्रमुख कारण डोमेनिकन गणराज्य में 25 नवम्बर 1960 की हृदय विदारक घटना है जिसमे तत्कालीन शासक राफेल टुजिलो ने मीरावेल मारिया के साथ उसकी दो बहिनों की निर्मम हत्या कर दी गयी। इन तीनों बहनों ने टुजिलो के तानाशाही शासन व्यवस्था का कड़ा विरोध किया था, जिसके कारण उनके साथ यह जघन्य कृत्य किया गया। जघन्य हत्या के बाद महिला अधिकारों के समर्थक और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं को रोकने के लिए डोमेनिकन गणराज्य के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने वर्ष 1981 से 25 नवंबर की तिथि को की हत्या की बरसी के रूप में शुरू किया, जिसके पश्चात दिसंबर 1999 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर वर्ष 2000 से प्रतिवर्ष 25 नवंबर को महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरोध के लिए एक दिवस मनाने का फैसला लिया गया

विश्व के प्रत्येक स्तर पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतराष्ट्रीय दिवस 2019 की थीम ‘ऑरेंज द वर्ल्ड: जनरेशन इक्वैलिटी स्टैन्ड अगेंस्ट रेप ' है। इस वर्ष अंतराष्ट्रीय दिवस पर कई सार्वजनिक कार्यक्रमों का समन्वय किया जा रहा है, हिंसा मुक्त भविष्य की आवश्यकता के लिए प्रतिष्ठित इमारतों और स्थलों को संतरे के रूप में देखा जाएगा । 

 

अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाने का उद्देश्य: अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को हिंसा से सुरक्षा के लिए व्यापक कदम उठाना और लोगों में जागरूकता पैदा करना है विश्व के विभिन्न देशों में धर्म, परम्परा के नाम पर महिलाओं के साथ अपराध किया जाता है जिसके कारण महिलाओं के आत्मसम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुंचती है और बढ़ती आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए जन आंदोलन भी जरूरी है। I

 

महिलाओं पर अत्याचार रोकने के लिए सबसे पहले हमें संकीर्ण पुरुष प्रधान मनोवृति, वासनाओं एवं महत्वाकांक्षी विचारधाराओं का त्याग करना होगा। जिन कुरीतियों का अपनाकर पुरुष आगे तो बढ़ गया लेकिन अपना विवेक और संतुलन खो बैठा जिसके कारण पुरुष समाज प्रदूषित और विकृत हो चुका है और महिला पर अत्याचार करता है। आज हमें जरूरत है अपनी संकीर्ण सोच और उन कारणों को जड़ से उखाड़कर फेंकना है जिसकी वजह से नारी जिन्दगी भर यह घूंट पीने को मजबूर ना हो। महिलाओं के आत्मसम्मान और मानवीय प्रतिष्ठा के वास्तविक सम्मान के लिए भूमिका प्रशस्त करना चाहिए ताकि उनके वास्तविक अधिकारों को दिलाने का काम जमीनी स्तर पर हो सके और बलात्कार, गैंगरेप, नारी उत्पीड़न, नारी-हिंसा घटनाओं का अंत हो सकें